13 जनवरी 2026 को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने नारा में ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया, जो ताकाइची के कार्यभार संभालने के बाद किसी कोरियाई राष्ट्रपति की पहली जापान यात्रा थी। यह बैठक दोनों देशों के बीच शटल डिप्लोमेसी की निरंतरता में हुई, जिसमें द्विपक्षीय सहयोग को गहरा और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। दोनों नेताओं ने कोरिया-जापान संबंधों को मजबूत करना समय की मांग बताया।
संयुक्त प्रेस वार्ता में राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने ताकाइची की अक्टूबर 2025 में ग्योंगजू यात्रा का उल्लेख किया और बताया कि नारा और ग्योंगजू दोनों देशों के साझा इतिहास और संस्कृति के प्रतीक हैं। उन्होंने ऐतिहासिक आदान-प्रदान की भूमिका को रेखांकित किया और कहा कि यह परंपरा आज द्विपक्षीय संबंधों की अमूल्य संपत्ति है। चर्चा में आर्थिक सहयोग, सुरक्षा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसे विषय शामिल थे।
दोनों पक्षों ने व्यापार से आगे बढ़कर आर्थिक सुरक्षा, विज्ञान-तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच वार्ता शुरू करने पर सहमति जताई। राष्ट्रपति ली ने बौद्धिक संपदा संरक्षण और युवा पीढ़ी के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए प्रवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने और तकनीकी योग्यता की पारस्परिक मान्यता जैसे उपायों का प्रस्ताव रखा। नेताओं ने सामाजिक समस्याओं जैसे कम जन्म दर और वृद्धावस्था पर संयुक्त कार्य समूह की उपलब्धियों की सराहना की।
सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों ने ट्रांसनेशनल अपराध, विशेषकर स्कैम अपराधों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई को मजबूत करने का निर्णय लिया, जिसमें जापान कोरियाई पुलिस द्वारा शुरू की गई अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहल में शामिल होगा। दोनों ने कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्ण परमाणु निरस्तीकरण और स्थायी शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। 1942 के जोसेई खान दुर्घटना के संबंध में, दोनों सरकारों ने पीड़ितों की पहचान के लिए डीएनए परीक्षण जारी रखने पर सहमति जताई, जो ऐतिहासिक मुद्दों के समाधान में महत्वपूर्ण प्रगति है।
यह शिखर सम्मेलन कोरिया-जापान संबंधों के अगले 60 वर्षों के लिए एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें गहन सहयोग और साझा भविष्य की उम्मीद है। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय सहयोग, विशेषकर चीन के साथ, और पूर्वोत्तर एशिया में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने की इच्छा व्यक्त की।
यह शिखर सम्मेलन ऐतिहासिक मतभेदों से आगे बढ़कर आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग के बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करना दर्शाता है कि दोनों देश भविष्य की चुनौतियों का मिलकर सामना करना चाहते हैं। व्यापार और नवाचार के लिए यह नई साझेदारी क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के लिए नए अवसर खोलती है।